यह कहर ही तो है। मोदी योगी के प्रति जनता के विश्वास का कहर। मोदी नीतीश की ईमानदारी का कहर। बीजेपी शिवसेना के गठजोड़ का कहर। जनता के मन के भावों के प्रति ममता की कटुता का कहर। कहीं खट्टर राज की निर्मलता और विश्वास का कहर। कहीं किसी एक बात का कहर। कहीं किसी और का कहर। यह कहर ही तो है जिसने एक मजदूर को यह कहने को मजबूर कर दिया था कि उसके बस्ती में कमल खिलेगा। उसके ससुराल बहराइच में कमल खिलेगा। उसके रिश्तेदारों के शहर शाहजहांपुर में कमल खिलेगा। आज जब चुनाव परिणाम देखता हूँ तो देखता हूँ कि यू पी के इन तीन शहरों में कमल ही खिला है। उसने कहा था - वह आखिरी घंटे में वोट करने जाता है , उसके बूथ पर कमल का बटन काला पड़ चुका था। ढीला भी। उसने सही कहा था। ई वी एम और उसपर होने वाला हल्ला अब ख़त्म हो गया है। बवाल मचाने वाले चुप हो गए हैं। उन्होंने हार मान ली है। अब आज रात प्राइम टाइम में मेरा एक पसंदीदा टीवी एंकर भी मान गया है कि जो सरकार आयी है वह विश्वास अर्जित कर चुकी है और इतना विश्वास अर्जित कर चुकी है कि अब किसी और के भी एक साथ आ जाने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। यह एंकर वैसे तो घबराया हुआ है मगर उम्मीद है कि वह अपनी नकारात्मकता को नहीं छोड़ेगा और कुछ नया जरूर करेगा। लोगों ने कहा - मोदी ने किया क्या ? लोग कहते थे - मोदी ने शौचालय दिया है। लोग सवाल करते थे - उससे क्या होगा ? पैसे तो प्रधान खा जाता है। लोग पूछते थे - मोदी ने किया क्या है ? जवाब मिलता था - गैस दी है। फिर सवाल होता था - दोबारा सिलेंडर कौन भराएगा ? जवाब देना भारी हो जाता था। लोग सवाल रखते थे - मोदी ने किया क्या है ? जवाब आता था - उज्ज्वला योजना के तहत लाइट कनेक्शन दिया है। फिर सवाल होता था - बिल कौन भरेगा ? जवाब कौन दे। लोग कहते - मोदी ने किया क्या है ? जवाब में आयुष्मान योजना का जिक्र करना पड़ता था। फिर पूछा जाता था - पर सारे हॉस्पिटल कहाँ शामिल हैं ? और इलाज के लिए जाने पर मरीजों को भगा दिया जाता है। तो इनको जवाब देना पड़ता था - समय लगेगा। लोग पूछते - मोदी ने किया क्या है ? कहना पड़ता - जन धन खाते खुलवाए हैं। सुनना पड़ता - पर पंद्रह लाख तो आये नहीं। समझाना मुश्किल होता कि मोदी ने कभी पंद्रह लाख अकाउंट में डलवाने की बात कही ही नहीं। लोग कहते - मोदी ने दो करोड़ रोजगार तो दिए ही नहीं ? पूछना पड़ता - कब कहा था और कहाँ लिखा था कि देंगे ? और फिर क्या पिछली सरकारों ने इतनी बेरोजगारी फैलाई थी कि दो करोड़ रोजगार प्रतिवर्ष देने से ही बेरोजगारी ख़त्म होती ? लोग सवाल पर सवाल करते और जवाब चाहते। फिर एक दिन सर्जिकल स्ट्राइक के बाद एयर स्ट्राइक भी हो गयी। बिजली गिरी। पूछा - लाशें गिनीं या पेड़ गिरा आये। क्रेडिबिलिटी किस तरह गिरती है , यह इस तरह से पता चलना शुरू हुआ और वह गिरनी शुरू हो गयी। पहले सर्जिकल स्ट्राइक पर और फिर एयर स्ट्राइक पर सवाल। अभिनन्दन का आना और सरकार का उसे भुनाना और विपक्ष का फिर सवाल - सरकार फायदा उठा रही है ? तो ? यदि स्ट्राइक फेल हो जाती तो राजनीति नहीं होती क्या ? होती। यह एयर स्ट्राइक ने परिदृश्य ही बदल दिया। राष्ट्रवाद हावी हुआ और फिर वो हुआ जो हम आज देख रहे हैं। मगर मेरा प्रिय एंकर कह रहा है कि अब पता चल रहा है कि अगर राष्ट्रवाद का मुद्दा न भी हुआ होता तो भी यह पता चला है कि लोग यही सरकार चुनते। उसे भी अब पता चल गया है कि सरकार ने कुछ तो किया ही है। कुछ लोगों को लोकतंत्र खतरे में दिखाई दे रहा है और अपना आराम भी। ईश्वर उनके आराम की रक्षा करे। और आज देश के उस नायक ने अपना वक्तव्य दिया है कार्यकर्ताओं के सामने। उसको सुनने के बाद भी यदि लोगों को कुछ समझ नहीं आ रहा है तो ईश्वर उन लोगों की समझ विकसित करे।
गुरुवार, 23 मई 2019
शनिवार, 18 मई 2019
वो बहेलिया है। जाल बिछाता है। कबूतर फंस जाते हैं। पांच साल से फंस रहे हैं। वे उसे समझ ही नहीं पाते। वह बार बार जाल डालता है। वे बार बार फंसते हैं। उनके बीच कई बूढ़े कबूतर हैं। नाराज है। क्योंकि मुखिया एक जवान को बनाया गया है। जवान ने अपने साथ युवा लिए है। बूढ़ों को दर किनार कर दिया है। बूढ़े चिढ़े हुए हैं। वे बीच बीच में गड़बड़ कर देते हैं। चाहते तो वे थे कि कबूतरों की दिग्विजय हो। उसके पास एक ऐसी मणि हो जो अलादीन के चिराग का काम करे। लेकिन यह मणि बहेलिये के लिए अलादीन का चिराग साबित हो रही है। उन बूढ़ों की कोई सुनता ही नहीं है। वे अवसादी से दिखते हैं। महत्व नहीं मिल रहा है। जवान कबूतर कई साल से अभी तक सीख ही रहा है और फंस जाता है। वह जवान कबूतर सोने का है। उस का बहुत महत्व है। मगर उस तक हर एक की पहुँच नहीं है। मिटटी से जुड़े विचार उस सोने से बने कबूतर के पास पहुँचते ही नहीं हैं। जाल मिट्टी में बिछा है। कबूतर उस जाल में फंसते हैं। उसको धीरे धीरे शायद कभी मिट्टी का महत्व समझ आये ? कबूतर बहेलिये से चिढ़ते हैं। नफ़रत करते हैं। स्वाभाविक है , कबूतर क्यों प्यार करें ?
गीता में कहा है - संगात संजायते कामो कामात क्रोधोभिजायते। क्रोधात भवति सम्मोहः सम्मोहात स्मृति विभ्रमः। स्मृति भ्रंशात बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात प्रणश्यति।।
यानि - संग से काम , काम से क्रोध , क्रोध से सम्मोह , सम्मोह से स्मृति विभ्रम , स्मृति विभ्रम से बुद्धि नाश , बुद्धि नाश से मनुष्य नष्ट हो जाता है।
सम्मोह यानि किसी के प्रति अतिशय आसक्ति। धनात्मक या ऋणात्मक। सकारात्मक या नकारात्मक। धनात्मक आसक्ति सही मार्ग में लग जाए तो कल्याण ही कर देती है। ऋणात्मक यानि नकारात्मक आसक्ति नफ़रत बढाती है। उन सबके दिमाग में वह बहेलिया इतने ऋणात्मक भाव से भरा है कि वे उससे आगे सोच ही नहीं पाते। उनकी गुटरगूँ सिर्फ उसको गाली देने तक ही है। वे बहेलिये को बहेलिया ही मानते हैं। अपने परिवार का हिस्सा नहीं मानते। वह भी ऐसे ही खुश है। चावल कहाँ हैं ? उसके कार्य जो लीक से हटकर होते हैं जिनसे कबूतर चिढ़ते हैं वही चावल का काम कर जाते हैं। इससे उसे गालियां मिल जाती हैं। यहीं वे कबूतर फंस जाते हैं। उनकी गालियां तोते , मैना , चीया , गोरैया , कोयल को अच्छी नहीं लगती। वह समझा भी देता है। देखो , मुझे गाली दे रहे हैं। बाकी पक्षी उसके साथ हो जाते हैं। वह सबको कहता है , मेरे साथ रहो , घर बनाकर दूंगा। वे सब साथ रहते हैं। कबूतर फंस जाते हैं। वह बार बार जाल बिछाता है। वे फंस जाते हैं। बहेलिया काम करके बहुत थक सा गया है। आज 18 मई 2019 को पहाड़ चढ़ गया है। कहता है ध्यान लगाएगा। ध्यान लगा रहा है। आम के आम गुठलियों के दाम। वह ध्यान लगाकर आराम कर रहा है। कबूतर अपनी मायावी दुनिया में व्यस्त हैं। माया मोह में फंसे हैं और फिर से बहेलिये को गाली दे रहे हैं। यही तो बहेलिये का जाल है। उसने फिर जाल बिछा दिया है। वह बहुत दूर चला गया है और यहाँ जाल बिछा गया है। कबूतर उसे कोस रहे हैं। वह ध्यान कर रहा है। कबूतर समझ ही नहीं पाते कि वह कब कैसे कहाँ जाल बिछा देगा। कबूतरों को पता ही नहीं है कि जाल कितने तरह के होते हैं। वे हर बार फंस जाते हैं। कबूतर मिल जुल रहे हैं। सोचते हैं इस बार बहेलिये बहेलिये को फंसा देंगे पर वे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि वह जो जाल बिछा गया है उसमे वे फिर फंस गए हैं। कल गौरैया चीया तोते फिर बहेलिये के साथ साथ हो जाएंगे क्योंकि बहेलिया यही तो चाहता है कि कबूतर फिर फंस जाएँ। वो ध्यान में है ईश्वर के और कबूतरों के भी। कबूतर हर वक़्त उसका ध्यान ही तो करते हैं।
गीता में कहा है - संगात संजायते कामो कामात क्रोधोभिजायते। क्रोधात भवति सम्मोहः सम्मोहात स्मृति विभ्रमः। स्मृति भ्रंशात बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात प्रणश्यति।।
यानि - संग से काम , काम से क्रोध , क्रोध से सम्मोह , सम्मोह से स्मृति विभ्रम , स्मृति विभ्रम से बुद्धि नाश , बुद्धि नाश से मनुष्य नष्ट हो जाता है।
सम्मोह यानि किसी के प्रति अतिशय आसक्ति। धनात्मक या ऋणात्मक। सकारात्मक या नकारात्मक। धनात्मक आसक्ति सही मार्ग में लग जाए तो कल्याण ही कर देती है। ऋणात्मक यानि नकारात्मक आसक्ति नफ़रत बढाती है। उन सबके दिमाग में वह बहेलिया इतने ऋणात्मक भाव से भरा है कि वे उससे आगे सोच ही नहीं पाते। उनकी गुटरगूँ सिर्फ उसको गाली देने तक ही है। वे बहेलिये को बहेलिया ही मानते हैं। अपने परिवार का हिस्सा नहीं मानते। वह भी ऐसे ही खुश है। चावल कहाँ हैं ? उसके कार्य जो लीक से हटकर होते हैं जिनसे कबूतर चिढ़ते हैं वही चावल का काम कर जाते हैं। इससे उसे गालियां मिल जाती हैं। यहीं वे कबूतर फंस जाते हैं। उनकी गालियां तोते , मैना , चीया , गोरैया , कोयल को अच्छी नहीं लगती। वह समझा भी देता है। देखो , मुझे गाली दे रहे हैं। बाकी पक्षी उसके साथ हो जाते हैं। वह सबको कहता है , मेरे साथ रहो , घर बनाकर दूंगा। वे सब साथ रहते हैं। कबूतर फंस जाते हैं। वह बार बार जाल बिछाता है। वे फंस जाते हैं। बहेलिया काम करके बहुत थक सा गया है। आज 18 मई 2019 को पहाड़ चढ़ गया है। कहता है ध्यान लगाएगा। ध्यान लगा रहा है। आम के आम गुठलियों के दाम। वह ध्यान लगाकर आराम कर रहा है। कबूतर अपनी मायावी दुनिया में व्यस्त हैं। माया मोह में फंसे हैं और फिर से बहेलिये को गाली दे रहे हैं। यही तो बहेलिये का जाल है। उसने फिर जाल बिछा दिया है। वह बहुत दूर चला गया है और यहाँ जाल बिछा गया है। कबूतर उसे कोस रहे हैं। वह ध्यान कर रहा है। कबूतर समझ ही नहीं पाते कि वह कब कैसे कहाँ जाल बिछा देगा। कबूतरों को पता ही नहीं है कि जाल कितने तरह के होते हैं। वे हर बार फंस जाते हैं। कबूतर मिल जुल रहे हैं। सोचते हैं इस बार बहेलिये बहेलिये को फंसा देंगे पर वे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि वह जो जाल बिछा गया है उसमे वे फिर फंस गए हैं। कल गौरैया चीया तोते फिर बहेलिये के साथ साथ हो जाएंगे क्योंकि बहेलिया यही तो चाहता है कि कबूतर फिर फंस जाएँ। वो ध्यान में है ईश्वर के और कबूतरों के भी। कबूतर हर वक़्त उसका ध्यान ही तो करते हैं।
कहते हैं नेवला साँप को खाता है। सांप मेंढक को और मेंढक कीड़ों को। यही पारिस्थितिकी है। और यदि किसी प्रजाति को वह न मिले जिसे खाने से यह प्राकृतिक संतुलन स्थापित होता है तो ? वे आपस में खुद एक दूसरे को ही खाने लगते हैं। और जब अपनी प्रजाति ही ख़त्म हो जाए तो वे अपने अंगों को ही खाकर जिन्दा रहने की कोशिश करते हैं।
राजनीति कहने के लिए सेवा का अवसर है और यथार्थ में यह सिर्फ सत्ता हथियाने का एक औजार। और ऐसे में सत्ता पक्ष विपक्ष को और विपक्ष सत्तापक्ष को अलग थलग करने के प्रयास में रहता है। राजनीति की इस महाभारत में सिर्फ एक बार अभिमन्यु के वध के द्वारा मर्यादाएं टूटनी चाहियें तो फिर सभी के लिए उदाहरण के साथ मर्यादाएं तोड़ने के मार्ग प्रशस्त हो जाते हैं। फिर जो चाहे इस गटर में नहा ले। बस उदाहरण देना पड़ता है कि उसने भी ऐसा ही किया था और किये जाओ।
लोकसभा चुनाव 2019 अब आखिरी दौर में है। इस चुनाव से पूर्व कई तरह के गठबंधन के प्रयास हुए। उत्तर प्रदेश ने एक सशक्त गठबंधन दिया है सपा और बसपा का। कांग्रेस को दर किनार कर , उसे अमेठी और रायबरेली में वॉकओवर देकर उस पर एहसान किया है इस गठबंधन ने। मगर बाकी जगह उसे नकारने में इन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई। अब जिस प्रजाति को , जिस विपक्ष को यह सोचना था कि एक होकर लड़ता वह आपस में ही लड़ने लगा। कांग्रेस के दरकिनार किये जाने पर स्वाभाविक था कि वह अपने लिए जगह बनाने का प्रयास करेगी। सो उसने तय किया कि सभी सीट पर लड़ा जाये। अब कभी जिस पार्टी का सारे देश में वर्चस्व रहा हो उसके लिए यह जरूरी होना था कि अपना अस्तित्व बचाये। जहां अपना अस्तित्व बचाने को दो घोरविरोधी दल एक हो गए वहां यह लड़ाई कांग्रेस के लिए भी बीजेपी से लड़ने के बजाय अपना अस्तित्व बचाने की हो गयी। अब ऐसे में कांग्रेस के लिए जितना जरूरी उत्तर प्रदेश में अपनी सीट दो से बढाकर पांच सात दस करना है उससे ज्यादा जरूरी यह हो गया कि किसी तरह इस गठबंधन को फेल किया जाये। यहां एक दूसरे को खाने की होड़ मच गयी क्योंकि यदि उत्तर प्रदेश में गठबंधन फेल हो जाता है तो फिर भविष्य में गठबंधन के रास्ते बंद हो जाएंगे और यदि गठबंधन सफल हो जाता है तो कांग्रेस के रास्ते बंद। इसलिए कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतना उतना जरूरी नहीं है जितना गठबंधन को विफल करना। और इसकी आवृति हम दिल्ली में भी देख सकते हैं।
अरविंद केजरीवाल स्वराज का झंडा लिए कांग्रेस को गलियाते गरियाते पहुँच गए दिल्ली विधानसभा में। और फिर लोक सभा में कांग्रेस को दो तीन सीट्स का ऑफर भी दे दिया। जाहिर था , पहले कांग्रेस को गलियाना , गरियाना , फिर सरकार कांग्रेस के सहयोग से बनाना और फिर इस्तीफ़ा और फिर कांग्रेस पर जबरन समर्थन देना , फिर से 67 सीट्स जीतकर सरकार बनाना। और अब फिर से कांग्रेस को दो तीन सीट्स का ऑफर देना। स्वाभाविक था , कांग्रेस के लिए इसे हज़म करना आसान नहीं था। इससे कांग्रेस की स्थानीय राजनीति भी ख़त्म हो जाती उन उन सीट्स पर। सो कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व जिसमें शीला दीक्षित प्रमुख हैं , के विरोध का सम्मान कर अकेले लड़ने का तय किया। इससे फिर विपक्ष में एक दूसरे को हटाने की होड़ लगी है। यहां कांग्रेस फिर से जानती है कि यदि केजरीवाल कहीं जीतते हैं तो कांग्रेस ख़त्म , और कांग्रेस जीती तो केजरी की राजनीति दिल्ली में ख़त्म। और यदि दोनों हारे तो बीजेपी के विकल्प के रूप में 2024 में कांग्रेस तैयार। यानि यहां भी विपक्ष एक दूसरे को निगल रहा है। सामने बीजेपी है और कांग्रेस में विकल्प बनने की छटपटाहट।
पश्चिम बंगाल में टी एम सी , कांग्रेस , कम्युनिस्ट और बीजेपी में होड़ है और लड़ाई फिर बीजेपी बनाम बिखरे विपक्ष के बीच है। हालाँकि मुख्य दो ही दल हैं , बीजेपी और टी एम सी। मगर विपक्ष यहां भी एक नहीं हो सका और आपस में टकरा रहा है तो भला बीजेपी से क्या लड़ता। केरल में कम्युनिस्ट पार्टी को चुनौती देने पहुंची कांग्रेस राहुल के द्वारा वामपंथियों को हराएगी या जीतकर बीजेपी का रास्ता रोकने की कोशिश करेगी या फिर बीजेपी। मगर यह एक और उदाहरण है जहां विपक्ष आपस में लड़ता फिर रहा है।
ऐसे में विपक्ष की स्थिति स्वयं जीतने की नहीं है बल्कि कई जगह दूसरे को मिटाकर खुद का रास्ता तैयार करने की है और यह दूसरा विपक्ष है न कि सत्तापक्ष। कांग्रेस को पता है , यह तमाम विपक्ष कभी कांग्रेस का ही हिस्सा हुआ करता था और कांग्रेस के पंख वक्त के साथ कटते गए और रक्त बीज की तरह ये नए दल उगते गए और अंततः आज कांग्रेस का ही खून पीकर जिन्दा है। कांग्रेस जानती है , जब तक वह इन रक्त बीजों से नहीं निपटेगी तब तक वह इस स्थिति में नहीं आएगी जिसमें किसी की इतनी हिम्मत न हो सके कि वह कांग्रेस को दर किनार करे। कांग्रेस चाहेगी कि उत्तर प्रदेश का गठबंधन किसी तरह ख़त्म हो जाए और 2022 में ये फिर दोबारा गठबंधन न कर सकें। क्योंकि यदि यह गठबंधन सफल हो गया तो कांग्रेस के लिए 2022 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और कठिन हो जाएगा। और गठबंधन के फेल होने पर कांग्रेस फिर से अपने को लड़ाई में शामिल कर लेगी और कभी अपने ही रहे मुस्लिम वोट को यह समझने में कामयाब हो जायेगी कि बीजेपी को सिर्फ कांग्रेस ही हरा सकती है और कोई नहीं , ताकि मुस्लिम वोट एकमुश्त कांग्रेस की झोली में आ सके और अपने परंपरागत वोट और सत्तापक्ष से नाराज वोटर्स के जरिये वह फिर से भविष्य में बीजेपी के सामने कड़ी हो सके।
अब देखना होगा कि अगला सप्ताह क्या करवट लेता है और भविष्य के लिए क्या तय करते हैं देश के वोटर्स।
राजनीति कहने के लिए सेवा का अवसर है और यथार्थ में यह सिर्फ सत्ता हथियाने का एक औजार। और ऐसे में सत्ता पक्ष विपक्ष को और विपक्ष सत्तापक्ष को अलग थलग करने के प्रयास में रहता है। राजनीति की इस महाभारत में सिर्फ एक बार अभिमन्यु के वध के द्वारा मर्यादाएं टूटनी चाहियें तो फिर सभी के लिए उदाहरण के साथ मर्यादाएं तोड़ने के मार्ग प्रशस्त हो जाते हैं। फिर जो चाहे इस गटर में नहा ले। बस उदाहरण देना पड़ता है कि उसने भी ऐसा ही किया था और किये जाओ।
लोकसभा चुनाव 2019 अब आखिरी दौर में है। इस चुनाव से पूर्व कई तरह के गठबंधन के प्रयास हुए। उत्तर प्रदेश ने एक सशक्त गठबंधन दिया है सपा और बसपा का। कांग्रेस को दर किनार कर , उसे अमेठी और रायबरेली में वॉकओवर देकर उस पर एहसान किया है इस गठबंधन ने। मगर बाकी जगह उसे नकारने में इन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई। अब जिस प्रजाति को , जिस विपक्ष को यह सोचना था कि एक होकर लड़ता वह आपस में ही लड़ने लगा। कांग्रेस के दरकिनार किये जाने पर स्वाभाविक था कि वह अपने लिए जगह बनाने का प्रयास करेगी। सो उसने तय किया कि सभी सीट पर लड़ा जाये। अब कभी जिस पार्टी का सारे देश में वर्चस्व रहा हो उसके लिए यह जरूरी होना था कि अपना अस्तित्व बचाये। जहां अपना अस्तित्व बचाने को दो घोरविरोधी दल एक हो गए वहां यह लड़ाई कांग्रेस के लिए भी बीजेपी से लड़ने के बजाय अपना अस्तित्व बचाने की हो गयी। अब ऐसे में कांग्रेस के लिए जितना जरूरी उत्तर प्रदेश में अपनी सीट दो से बढाकर पांच सात दस करना है उससे ज्यादा जरूरी यह हो गया कि किसी तरह इस गठबंधन को फेल किया जाये। यहां एक दूसरे को खाने की होड़ मच गयी क्योंकि यदि उत्तर प्रदेश में गठबंधन फेल हो जाता है तो फिर भविष्य में गठबंधन के रास्ते बंद हो जाएंगे और यदि गठबंधन सफल हो जाता है तो कांग्रेस के रास्ते बंद। इसलिए कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतना उतना जरूरी नहीं है जितना गठबंधन को विफल करना। और इसकी आवृति हम दिल्ली में भी देख सकते हैं।
अरविंद केजरीवाल स्वराज का झंडा लिए कांग्रेस को गलियाते गरियाते पहुँच गए दिल्ली विधानसभा में। और फिर लोक सभा में कांग्रेस को दो तीन सीट्स का ऑफर भी दे दिया। जाहिर था , पहले कांग्रेस को गलियाना , गरियाना , फिर सरकार कांग्रेस के सहयोग से बनाना और फिर इस्तीफ़ा और फिर कांग्रेस पर जबरन समर्थन देना , फिर से 67 सीट्स जीतकर सरकार बनाना। और अब फिर से कांग्रेस को दो तीन सीट्स का ऑफर देना। स्वाभाविक था , कांग्रेस के लिए इसे हज़म करना आसान नहीं था। इससे कांग्रेस की स्थानीय राजनीति भी ख़त्म हो जाती उन उन सीट्स पर। सो कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व जिसमें शीला दीक्षित प्रमुख हैं , के विरोध का सम्मान कर अकेले लड़ने का तय किया। इससे फिर विपक्ष में एक दूसरे को हटाने की होड़ लगी है। यहां कांग्रेस फिर से जानती है कि यदि केजरीवाल कहीं जीतते हैं तो कांग्रेस ख़त्म , और कांग्रेस जीती तो केजरी की राजनीति दिल्ली में ख़त्म। और यदि दोनों हारे तो बीजेपी के विकल्प के रूप में 2024 में कांग्रेस तैयार। यानि यहां भी विपक्ष एक दूसरे को निगल रहा है। सामने बीजेपी है और कांग्रेस में विकल्प बनने की छटपटाहट।
पश्चिम बंगाल में टी एम सी , कांग्रेस , कम्युनिस्ट और बीजेपी में होड़ है और लड़ाई फिर बीजेपी बनाम बिखरे विपक्ष के बीच है। हालाँकि मुख्य दो ही दल हैं , बीजेपी और टी एम सी। मगर विपक्ष यहां भी एक नहीं हो सका और आपस में टकरा रहा है तो भला बीजेपी से क्या लड़ता। केरल में कम्युनिस्ट पार्टी को चुनौती देने पहुंची कांग्रेस राहुल के द्वारा वामपंथियों को हराएगी या जीतकर बीजेपी का रास्ता रोकने की कोशिश करेगी या फिर बीजेपी। मगर यह एक और उदाहरण है जहां विपक्ष आपस में लड़ता फिर रहा है।
ऐसे में विपक्ष की स्थिति स्वयं जीतने की नहीं है बल्कि कई जगह दूसरे को मिटाकर खुद का रास्ता तैयार करने की है और यह दूसरा विपक्ष है न कि सत्तापक्ष। कांग्रेस को पता है , यह तमाम विपक्ष कभी कांग्रेस का ही हिस्सा हुआ करता था और कांग्रेस के पंख वक्त के साथ कटते गए और रक्त बीज की तरह ये नए दल उगते गए और अंततः आज कांग्रेस का ही खून पीकर जिन्दा है। कांग्रेस जानती है , जब तक वह इन रक्त बीजों से नहीं निपटेगी तब तक वह इस स्थिति में नहीं आएगी जिसमें किसी की इतनी हिम्मत न हो सके कि वह कांग्रेस को दर किनार करे। कांग्रेस चाहेगी कि उत्तर प्रदेश का गठबंधन किसी तरह ख़त्म हो जाए और 2022 में ये फिर दोबारा गठबंधन न कर सकें। क्योंकि यदि यह गठबंधन सफल हो गया तो कांग्रेस के लिए 2022 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और कठिन हो जाएगा। और गठबंधन के फेल होने पर कांग्रेस फिर से अपने को लड़ाई में शामिल कर लेगी और कभी अपने ही रहे मुस्लिम वोट को यह समझने में कामयाब हो जायेगी कि बीजेपी को सिर्फ कांग्रेस ही हरा सकती है और कोई नहीं , ताकि मुस्लिम वोट एकमुश्त कांग्रेस की झोली में आ सके और अपने परंपरागत वोट और सत्तापक्ष से नाराज वोटर्स के जरिये वह फिर से भविष्य में बीजेपी के सामने कड़ी हो सके।
अब देखना होगा कि अगला सप्ताह क्या करवट लेता है और भविष्य के लिए क्या तय करते हैं देश के वोटर्स।
गुरुवार, 16 मई 2019
कृपया व्हाट्स ऍप यूनिवर्सिटी के छात्र न पढ़ें -
हम सब क्या वत्स व्हाट्स ऍप यूनिवर्सिटी के छात्र हैं ? क्या हमारी व्युत्पत्ति क्षमता ख़त्म हो चुकी है ? क्या हमने कुछ कहने से पहले सोचना विचारना छोड़ दिया है ? क्या ऐसा कुछ है ?
आज के इस दौर में जब देश में यह एक तथाकथित अवधारणा फैलाई जा रही है कि बोलने की आज़ादी नहीं है तब , जब यह कहा जा रहा है कि पी एम मोदी के खिलाफ बोलना देशद्रोह सा समझा जा रहा है तब क्या वाकई ऐसा है ? शायद नहीं। पी एम क्या देश होता है ? नहीं। तो फिर एक व्यक्ति के खिलाफ बोलना देशद्रोह कैसा ? देश व्यक्ति से कहीं बहुत आगे है। है न ?
क्या शाब्दिक हिंसा का भी कोई स्थान होना चाहिए ? नहीं। क्या मोदी जी के खिलाफ की गई शाब्दिक हिंसा देश के प्रति की गई हिंसा मानी जा सकती है ? नहीं। क्यों ? क्योंकि मोदी जी देश नहीं हैं। न मनमोहन जी देश थे। और न उनसे पूर्व के प्रधानमंत्री या अन्य कोई। तो फिर यह तय है कि व्यक्ति के प्रति की गयी शाब्दिक हिंसा या कुछ भी किया गया उस देश के प्रति किया गया नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि वह व्यक्ति देश नहीं है। क्योंकि इस देश में 130 करोड़ लोग हैं जो उस स्थान को भर सकते हैं यदि काबिलियत पैदा करें तो ?
क्या गाँधी जी देश थे ? यदि हाँ तो गोडसे देश द्रोही था। यदि नहीं तो फिर गोडसे देशद्रोही कैसे ? गाँधी जी देश के नायक थेऔर गोडसे उस नायक का हत्यारा। एक ऐसा हत्यारा जो गाँधी जी के प्रति क्रोध से भरा था। विभाजन के बाद जब धार्मिक आधार पर लोग अपने वतन जाने लगे तब गाँधी जी का यह विचार कि जो जहां है वह वहीँ रहेगा और उनके प्रति यह आरोप कि वे पाक के प्रति जरूरत से ज्यादा उदार होने की कोशिश थे और पाक को 55 करोड़ रुपये देने के लिए अनशन पर बैठ गए थे तब उन हालातों में एक व्यक्ति उनके विचारों से असहमत होकर उनकी हत्या कर देता है। जीवन देने की क्षमता न हो तो जीवन लेने का तो कोई अधिकार नहीं है। गोडसे को फांसी हुई और सही हुई। किसी की हत्या को किसी तरह से भी जायज ठहराना नाजायज कृत्य से कम नहीं है। विचार को विचार से मारा जाता है और शरीर की हत्या से विचार नहीं मारा करते। गाँधी जी देश के नायक थे। कोई कहे कि पिता थे राष्ट्र पिता थे तो आर टी आई से तो पता ही नहीं चला कि उन्हें किसने राष्ट्रपिता कहा ? लोग कहते हैं कि पहली बार सुभाष चंद्र बोस ने कहा था। खैर , पर देश को किसने तोडा ? जिन्ना ने ? तो क्यों न जिन्ना को देशद्रोही कहा जाए। परिवार को तोड़ने वाला परिवार द्रोही हो सकता है तो देश को तोड़ने वाला देश द्रोही क्यों नहीं ? क्या गोडसे ने देश को तोडा था ? नहीं। उसे देशद्रोही कैसे कहूँ। गाँधी जी देश नहीं थे नायक थे गोडसे हत्यारा था सजा मिली। मिलनी भी चाहिए थी। पर वह देशद्रोही कैसे ? उसने जो किया वैचारिक असहमति के कारण किया और उसके कारण शायद उसकी नजर में जायज रहे होंगे तभी वह रेडियो पर पांच मिनट का समय चाहता था ताकि लोगों को बता सके कि उसने गाँधी जी को क्यों मारा ? मगर उसे वह समय नहीं दिया गया। यह भी वैचारिक हिंसा थी। किसी को फांसी होने वाली हो और वह पांच मिनट के लिए बोलने का समय मांगे और उसे समय न मिले। मगर उस समय के हालातों में जिसे जब जो ठीक लगा वह किया गया। मगर बात वही है कि गाँधी जी का हत्यारा होना एक अलग बात है और देश भक्त या देश द्रोही होना अलग बात है।
आतंकवाद एक विचारधारा होती है जो किसी उद्देश्य को लेकर चलती है। उसका एक संगठन होता है। उनका एक उद्देश्य होता है। मगर एकल व्यक्ति कभी आतंकवादी नहीं होता। वरना हमें हर हत्यारे को आतंकवादी कहना पड़ेगा। खालिस्तान का आतंकवाद एक उद्देश्य के साथ किया गया था। जैश ए मोहम्मद , लश्कर ए तोयबा , आइसिस जैसे संगठन आतंकवादी हैं क्योंकि एक उद्देश्य के साथ चल रहे हैं पर एकल व्यक्ति जो किसी को किसी घृणा या किसी पर गुस्से से हमला करता है हत्या करता है वह आतंकवादी नहीं हो सकता।
इसलिए जब कोई गोडसे को देशद्रोही कहने लगता है तब सोचने लगता हूँ कि किसी ने आजतक जिन्ना को तो देश द्रोही नहीं कहा। क्यों ? जिन्ना देशद्रोही क्यों नहीं ? और गोडसे जिसे देश तोड़ने का जिम्मेदार तो कतई नहीं माना जा सकता वह देश द्रोही कैसे ? वह हत्यारा है। निंदनीय है। मगर देशद्रोही या आतंकवादी कैसे ? और फिर यह राष्ट्र तो हज़ारों वर्षों से है , न की कुछ वर्षों से। देश के खिलाफ की गयी साज़िश देश द्रोह में आएगी या फिर मानव या महामानव के खिलाफ की गयी साज़िश या हत्या भी देश द्रोह में है ? सोचना गलत क्यों हैं ? लेकिन गोडसे गलत था इसमें कोई दो राय नहीं है क्योंकि उसे हत्या का हक़ नहीं था। यह बात अलग है कि रेडियो पर अपने उद्बोधन में वह अपने को सही ठहराता या उसके भाई गोपाल गोडसे ने जो अपनी पुस्तकों - गाँधी वध क्यों और गाँधी वध और मैं , के द्वारा इसे सही ठहरने की कोशिश की है , उस पर किताब पढ़ने वाले स्वयं सोचेंगे जो ebook के रूप में नेट पर pdf के रूप में उपलब्ध है।
हम सब क्या वत्स व्हाट्स ऍप यूनिवर्सिटी के छात्र हैं ? क्या हमारी व्युत्पत्ति क्षमता ख़त्म हो चुकी है ? क्या हमने कुछ कहने से पहले सोचना विचारना छोड़ दिया है ? क्या ऐसा कुछ है ?
आज के इस दौर में जब देश में यह एक तथाकथित अवधारणा फैलाई जा रही है कि बोलने की आज़ादी नहीं है तब , जब यह कहा जा रहा है कि पी एम मोदी के खिलाफ बोलना देशद्रोह सा समझा जा रहा है तब क्या वाकई ऐसा है ? शायद नहीं। पी एम क्या देश होता है ? नहीं। तो फिर एक व्यक्ति के खिलाफ बोलना देशद्रोह कैसा ? देश व्यक्ति से कहीं बहुत आगे है। है न ?
क्या शाब्दिक हिंसा का भी कोई स्थान होना चाहिए ? नहीं। क्या मोदी जी के खिलाफ की गई शाब्दिक हिंसा देश के प्रति की गई हिंसा मानी जा सकती है ? नहीं। क्यों ? क्योंकि मोदी जी देश नहीं हैं। न मनमोहन जी देश थे। और न उनसे पूर्व के प्रधानमंत्री या अन्य कोई। तो फिर यह तय है कि व्यक्ति के प्रति की गयी शाब्दिक हिंसा या कुछ भी किया गया उस देश के प्रति किया गया नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि वह व्यक्ति देश नहीं है। क्योंकि इस देश में 130 करोड़ लोग हैं जो उस स्थान को भर सकते हैं यदि काबिलियत पैदा करें तो ?
क्या गाँधी जी देश थे ? यदि हाँ तो गोडसे देश द्रोही था। यदि नहीं तो फिर गोडसे देशद्रोही कैसे ? गाँधी जी देश के नायक थेऔर गोडसे उस नायक का हत्यारा। एक ऐसा हत्यारा जो गाँधी जी के प्रति क्रोध से भरा था। विभाजन के बाद जब धार्मिक आधार पर लोग अपने वतन जाने लगे तब गाँधी जी का यह विचार कि जो जहां है वह वहीँ रहेगा और उनके प्रति यह आरोप कि वे पाक के प्रति जरूरत से ज्यादा उदार होने की कोशिश थे और पाक को 55 करोड़ रुपये देने के लिए अनशन पर बैठ गए थे तब उन हालातों में एक व्यक्ति उनके विचारों से असहमत होकर उनकी हत्या कर देता है। जीवन देने की क्षमता न हो तो जीवन लेने का तो कोई अधिकार नहीं है। गोडसे को फांसी हुई और सही हुई। किसी की हत्या को किसी तरह से भी जायज ठहराना नाजायज कृत्य से कम नहीं है। विचार को विचार से मारा जाता है और शरीर की हत्या से विचार नहीं मारा करते। गाँधी जी देश के नायक थे। कोई कहे कि पिता थे राष्ट्र पिता थे तो आर टी आई से तो पता ही नहीं चला कि उन्हें किसने राष्ट्रपिता कहा ? लोग कहते हैं कि पहली बार सुभाष चंद्र बोस ने कहा था। खैर , पर देश को किसने तोडा ? जिन्ना ने ? तो क्यों न जिन्ना को देशद्रोही कहा जाए। परिवार को तोड़ने वाला परिवार द्रोही हो सकता है तो देश को तोड़ने वाला देश द्रोही क्यों नहीं ? क्या गोडसे ने देश को तोडा था ? नहीं। उसे देशद्रोही कैसे कहूँ। गाँधी जी देश नहीं थे नायक थे गोडसे हत्यारा था सजा मिली। मिलनी भी चाहिए थी। पर वह देशद्रोही कैसे ? उसने जो किया वैचारिक असहमति के कारण किया और उसके कारण शायद उसकी नजर में जायज रहे होंगे तभी वह रेडियो पर पांच मिनट का समय चाहता था ताकि लोगों को बता सके कि उसने गाँधी जी को क्यों मारा ? मगर उसे वह समय नहीं दिया गया। यह भी वैचारिक हिंसा थी। किसी को फांसी होने वाली हो और वह पांच मिनट के लिए बोलने का समय मांगे और उसे समय न मिले। मगर उस समय के हालातों में जिसे जब जो ठीक लगा वह किया गया। मगर बात वही है कि गाँधी जी का हत्यारा होना एक अलग बात है और देश भक्त या देश द्रोही होना अलग बात है।
आतंकवाद एक विचारधारा होती है जो किसी उद्देश्य को लेकर चलती है। उसका एक संगठन होता है। उनका एक उद्देश्य होता है। मगर एकल व्यक्ति कभी आतंकवादी नहीं होता। वरना हमें हर हत्यारे को आतंकवादी कहना पड़ेगा। खालिस्तान का आतंकवाद एक उद्देश्य के साथ किया गया था। जैश ए मोहम्मद , लश्कर ए तोयबा , आइसिस जैसे संगठन आतंकवादी हैं क्योंकि एक उद्देश्य के साथ चल रहे हैं पर एकल व्यक्ति जो किसी को किसी घृणा या किसी पर गुस्से से हमला करता है हत्या करता है वह आतंकवादी नहीं हो सकता।
इसलिए जब कोई गोडसे को देशद्रोही कहने लगता है तब सोचने लगता हूँ कि किसी ने आजतक जिन्ना को तो देश द्रोही नहीं कहा। क्यों ? जिन्ना देशद्रोही क्यों नहीं ? और गोडसे जिसे देश तोड़ने का जिम्मेदार तो कतई नहीं माना जा सकता वह देश द्रोही कैसे ? वह हत्यारा है। निंदनीय है। मगर देशद्रोही या आतंकवादी कैसे ? और फिर यह राष्ट्र तो हज़ारों वर्षों से है , न की कुछ वर्षों से। देश के खिलाफ की गयी साज़िश देश द्रोह में आएगी या फिर मानव या महामानव के खिलाफ की गयी साज़िश या हत्या भी देश द्रोह में है ? सोचना गलत क्यों हैं ? लेकिन गोडसे गलत था इसमें कोई दो राय नहीं है क्योंकि उसे हत्या का हक़ नहीं था। यह बात अलग है कि रेडियो पर अपने उद्बोधन में वह अपने को सही ठहराता या उसके भाई गोपाल गोडसे ने जो अपनी पुस्तकों - गाँधी वध क्यों और गाँधी वध और मैं , के द्वारा इसे सही ठहरने की कोशिश की है , उस पर किताब पढ़ने वाले स्वयं सोचेंगे जो ebook के रूप में नेट पर pdf के रूप में उपलब्ध है।
रविवार, 12 मई 2019
एन एच 58 पर कुछ मजदूर काम कर रहे हैं। स्थान मोतीचूर , हरिपुर कलां , रायवाला , देहरादून। हाईवे ब्रिज का निर्माण कार्य चल रहा है। सुबह का समय है। बगल के बगीचे को हाईवे के ठेकेदार द्वारा किराये पर लिया गया है और वहाँ पर उन मजदूरों के रहने के लिए टीन shade तैयार किये गए हैं और शौचालय आदि की स्थायी व्यवस्था की गयी है। सुबह साढ़े आठ बजे के लगभग कुछ मजदूर एक दीवार पर बैठे हैं। उनसे यूं ही बात शुरू करता हूँ और कहता हूँ कि अब उनके न्याय का समय आ गया है और राहुल गाँधी यदि पी एम बने तो उनको हर माह छह हज़ार रुपये देंगे यानि साल में बहत्तर हज़ार। यह सुनते ही उनमें से एक ज्यादा उम्र का मजदूर तत्काल प्रतिक्रिया देता है - नहीं नहीं , अबकी फिर मोदी आएगा। पूछता हूँ - क्यों ? कहता है - क्यों क्या ? मोदी ही आएगा। मोदी काम कर रहा है। पूछता हूँ तो बताता है - अभी थोड़े दिन पहले वह और उसके साथी इलाहाबाद थे और इलाहाबाद में हाई कोर्ट के पास जो हाई वे है उसके निर्माण में उसका ठेकेदार ही काम कर रहा था। उसे बताता हूँ - मैं भी कुछ समय बमरौली रहकर आया हूँ जो इलाहाबाद में है तो बताता है कि वह तो बस्ती का रहने वाला है। कहता है - बस्ती में बीजेपी ही जीतेगी। फिर बताता है - ससुराल बहराइच में है और बहराइच में फ़ोन करके पता लगाया है कि वहाँ भी कमल का फूल ही जीतेगा। फिर बताता है - मेरे कई रिश्तेदार शाहजहां पुर में हैं और सब बता रहे हैं कि शाहजहांपुर में भी बीजेपी ही जीतेगी। उससे उसके अपने इलाके बस्ती के बारे में पूछता हूँ - कैसे पता कर लेते हो ? कहता है कि हर चुनाव में आखिरी घंटे में वोट डालने जाते हैं हम लोग। और इस बार भी गए। कमल के फूल का बटन कला हो चूका था और ढीला भी और अंदर को धंस गया था। बाकि बटन साफ सुथरे थे। हमारे यहां नब्बे प्रतिशत वोट बीजेपी को पड़ा है। मैं उसके इस ज्ञान पर हैरान हो जाता हूँ कि किस तरह वह यह पता लगा लेता है कि वोट कहाँ पड़ा है। पूछता हूँ - गत बंधन तो बहुत मजबूत है ? कहता है - नहीं नहीं। गठबंधन कुछ नहीं है। क्यों ? क्यों क्या ? कमल खिलेगा। क्यों भाई ? काम किया है। क्या काम किया है ? काम ? गैस दिया है , बिजली दी है , मकान दे रहा है , आयुष्मान योजना दिया है। हमारे इलाके में आकर देखो। लोग कितने खुश हैं। अकाउंट खुलवाया है। शौचालय बनवाया है। महिलाओं को कितनी सहूलियत है। उनसे पूछकर देखो। मुस्लिम महिलाएं जो तीन तलाक़ से परेशां रहती थीं वो भी खुश हैं। सुनो , घर से आदमी भी निकलेगा और औरत भी। वोट आदमी चाहे जहां डाले पर औरत कमल का फूल ही दबाएंगी। वह और उसके साथी आत्मविश्वास से लबरेज हैं। यहां यह बताना बहुत जरूरी है कि उत्तर प्रदेश में वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 34 . 11 प्रतिशत वोट मिला था , बी एस पी को 27 . 06 और सपा को 30 . 91 और कांग्रेस को 02 . 64 प्रतिशत। अब यदि यहाँ पर गठबंधन के वोट को मिलाया जाए तो यह 57 . 97 है। ऐसे में बीजेपी के 34 . 11 प्रतिशत वोट इतने कम हैं कि बीजेपी का पिछड़ना तय है। मगर इस मजदूर का क्या करूँ जो कहता है बीजेपी जीतेगी। यदि सत्तावन प्रतिशत वोट पाने वाला गठबंधन उसकी निगाह में हार रहा है तो फिर यह गठबंधन किसलिए है ? क्या गठबंधन का वोट आपस में स्थानांतरित नहीं हो पा रहा है जो इस मजदूर के शब्दों से पता चलता है। यदि ऐसा है तो पिछले चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में डुमरियागंज , आज़म गढ़ , फिरोजा बाद , मैनपुरी और बदायूं , ये पांच सीट पर ही सत्तावन प्रतिशत से ज्यादा वोट वाले हैं जहां वर्तमान गठबंधन को इतनी बढ़त मिली थी। बाकि सभी सीटों पर गठबंधन का वोट इससे कम है तो वहाँ क्या स्थिति होगी यह सोचने लायक बात है। हालांकि सिर्फ बस्ती में ही बीजेपी जीती थी और बाकि चार सीटों पर सपा की जीत हुई थी। सो सोचने लायक बात है कि आगे क्या होने वाला है। थोड़ी देर में वे खाना खाने चले जाते हैं और मैं अपने काम पर लग जाते हूँ। आज रविवार का दिन है।
एक सब्जी वाला है। रोज आता था। कुछ दिन से गायब है। बता गया था कि बदायूं जा रहा है मोदी को वोट डालेगा। पूछा - क्यों ? बोला - मेरा और मेरे भाई का मकान बन रहा है। पौने चार लाख रूपया हम दोनों के अकाउंट में आ गया है। हमारे लिए तो मोदी ही ठीक है।
स्कूल में हूँ। एक महिला स्कूल में आती है। बच्चे को छुट्टी चाहिए। कहाँ जाना है ? बिहार जाना है। क्यों ? बारह तारिख को चुनाव है मोदी जी को वोट डालना है। सभी लोग एक दूसरे का मुँह देखने लगते हैं। कुछ और काम भी होगा ? हाँ , शादी भी है। कब है शादी ? उन्नीस को शादी है। पर जल्दी जा रहे हैं ताकि मोदी जी को वोट डाल सकें। महिला बाहर चली जाती है और हमसे हँसे बिना नहीं रहा जाता। एक और मजदूर कुछ दिन पूर्व मिला था जो बताकर बिहार जा रहा था कि मोदी जी को वोट डालने जा रहा है। एक स्कूल में कुछ बच्चे कम आ रहे हैं। यू पी और बिहार के ही हैं। वोट डालने गए हैं। बताकर गए हैं।
वोट डालने के प्रति इतनी उत्सुकता देखकर हैरान हूँ। गरीब आदमी क्या इस तरह भी वोट डालने जाता है ? खुद से पूछता हूँ और खुद को यह जवाब देकर शांत हो जाता हूँ कि 23 मई को देखते है क्या होता है। सोचें , क्या होने वाला है ?
शनिवार, 4 मई 2019
आज एक और थप्पड़। किसलिए ? इसलिए कि उसने कुछ वादे किये थे और वह उन्हें पूरे नहीं कर सका। तो ? थप्पड़ ? तो फिर उनके थप्पड़ कहाँ हैं जिनके द्वारा नहीं पूरे किये गए कामों को करने का वादा उसने किया था ? इस देश के नेता आज भी उसी झोपडी से निकलते हैं और चुनाव की शुरुआत करते हैं जिस झोपडी से कभी उनके पुरखे निकले थे तो फिर इतने लम्बे काल खंड में ऐसे कितने ही वादे किस किसने नहीं किये ? 1945 में जब नागासाकी और हेरोशिमाँ बर्बाद हो गए तब यह कौन सी प्रेरणा थी कि वह देश आज कहीं और हैं और ठीक दो वर्ष बाद आज़ाद भारत आज कहीं भी नहीं है ? यह कहना गुनाह से कम नहीं होगा कि हमारी आबादी ज्यादा थी। तो फिर क्यों हम आज भी एक बुलेट ट्रैन के लिए तरस रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि 2022 में अहमदाबाद और मुंबई के बीच चलने वाली ट्रैन चल पड़ेगी और एक नया युग शुरू होगा ? तो फिर इतने लम्बे काल खंड में जिस जिस ने वादों का संसार रचा है उस उस के हिस्से के थप्पड़ कहाँ हैं ? या फिर सिर्फ एक ही व्यक्ति है जिस पर हम वादाखिलाफी का आरोप लगाकर जब चाहे उस पर थप्पड़ बरसा दें ?
उसने कहा था मैं यह करूंगा , मैं वह करूंगा मगर वह कर नहीं पाया , ठीक हैं , मगर यह तो बहुतों ने कहा। फिर एक से नाराजगी क्यों ? वह तो पहले डेढ़ माह में ही सरकार छोड़ गया था पहली बार। और दूसरी बार आपने ही उसे मौका दिया। कुछ थप्पड़ दूसरों के लिए भी बचाकर रखते। हिम्मत नहीं हुई होगी दूसरों पर थप्पड़ चलाने की। यह नया है। जितना चाहे ---
उसने आरोप लगाए। ठीक है। किसने आरोप नहीं लगाए। किसने आरोप लगाने के बाद सत्ता में आने के बाद किस किसको जेल भेजा ? और कितनों ने सेटिंग नहीं की । तो फिर उनके थप्पड़ कहाँ हैं?
उसने अपने गुरु को साधकर उल्लू सीधा किया। ठीक है। मगर इस देश में वर्षों से जनता को बेवकूफ बनाकर जो अपना उल्लू सीधा किया जा रहा है उनके थप्पड़ कहाँ हैं ?
उसके विचार मुझे पसंद नहीं। ठीक हैं। मगर मुझे तो कइयों के विचार पसंद नहीं हैं। तो फिर उनके थप्पड़ कहाँ हैं।
वह पढ़ा लिखा है। क्या सिर्फ इसलिए सॉफ्ट टारगेट है? मुझे पता है कि वह राजनीति में नया है। उसने अपने अहंकार के ही कारण अपने कितनों को ही दूर कर लिया है। उनका यह अहंकार उनके लिए भरी पड़ने वाला है मगर यह भी दिलचस्प है कि सिर्फ यही है जो लगातार थप्पड़ ही खा रहा है। पर राजनीति में इस तरह थप्पड़ मारने वाले निहायत ही गलत हैं और माफ़ी के लायक नहीं हैं। शुरुआत तो कहीं और से होनी चाहिए थी। वो सब तो मजे ले रहे हैं जो इन थप्पड़ों के सही मायने में हक़दार हैं। कुछ थप्पड़ औरों के लिए भी बचा कर रखिये यदि हिम्मत है तो ? किसी से सहमत न होना सबका हक़ है मगर थप्पड़ सिर्फ किसी एक के लिए संरक्षित रखे जाएँ यह अन्याय ही है।
शनिवार, 14 अप्रैल 2018
आज चौदह अप्रैल है और अम्बेडकर दिवस। भीमराव राम जी आंबेडकर। जी हाँ , कैंब्रिज की उनकी डिग्री में यही नाम लिखा है। भगवान का शुक्र मनाना चाहिए कि इस बात पर दो अप्रैल नहीं हुआ क्योंकि यह सच भी है। उनके पिता का नाम रामजी मालोजी आंबेडकर। दक्षिण भारत सहित देश के कई हिस्सों में कई परम्परा हैं जिसमे पिता का नाम भी साथ ही लगाया जाता है। थोड़ी सी आपत्तियां उठी मगर शांत हो गयीं। 1991 में इन पर एक डाक टिकट भी निकला जिस पर इनका नाम यही है। इससे पहले भी इसी नाम वाले डाक टिकट निकल चुके हैं। लेकिन आपत्ति क्यों नहीं हुई। कम से कम इस बात पर तो आपत्ति तो होती कि इनके नाम से राम जी हटाया किसने था। लेकिन कोई हल्ला नहीं है। उनको भी नहीं जिन्हें कुछ दिन पहले सिर्फ इस बात से आपत्ति हो गयी थी कि डॉ अम्बेकर की मूर्ति को भगवा कर दिया गया था। जब आंबेडकर बौद्ध बने तब उन्होंने भगवा वेश ही धारण किया था क्योंकि उनका वस्त्र ही भगवा या बहुत हल्का लाल होता है। क्या वे नहीं समझ पाते कि क्या कर रहे हैं कि क्या कर रहे हैं ? शायद नहीं। उन्हें वह भगवा सिर्फ इसलिए पसंद नहीं क्योंकि वह एक पार्टी के ध्वज का रंग है। उन्हें नहीं मतलब कि भगवा राग का , विराग का , ऊर्जा का , सूर्योदय का प्रतीक है। उनको नीला पसंद है। आंबेडकर वकील थे और उनके कोट का रंग काला हुआ करता था। वकील काला कोट पहनते हैं। यह नीला रंग कब से आया , सब जानते हैं।
किसी को इस बात पर कोई मलाल नहीं है कि किसी ने अतीत में इनके नाम से राम जी हटा दिया था। वर्षों पहले सरकारी चैनल पर एक कार्यक्रम आया करता था जिसका नाम था - कृषि दर्शन , कृषि दर्शन की शुरुआत राम राम जी से होती थी जिसका मतलब सर नमस्कार होता था जैसा कि गांव में नमस्ते के लिए राम राम कहा जाता है। लेकिन इस देश की धर्मनिरपेक्ष आँखों को यह राम राम जी नहीं सुहाया। हटा दिया। और बाद में आंबेडकर जी के नाम से भी। भीमराव रामजी आंबेडकर। इसी का संक्षेप है - बी आर आंबेडकर।
डॉ आंबेडकर हिन्दू धर्म में अस्पृश्यता से इतने दुखी हुए कि बौद्ध धर्म अपना लिया मगर आज उनकी ही लड़ाई है कि वे किसके हैं। वे बौद्ध हैं। क्या हममें से कोई दलाई लामा के लिए लड़ रहा है कि वे किसके हैं , नहीं। क्योंकि दलाई लामा ने संविधान नहीं लिखा। मगर संविधान तो उन्होंने सबके लिए लिखा तो फिर यह लड़ाई क्यों कि वे किसके हैं ? कुछ लोगों ने जिंदगी भर अम्बेकर के लिए कुछ नहीं किया यहां तक कि उन्हें चुनाव तक हरा दिया मगर वे भी उनका झंडा उठाये फिर रहे हैं। उनका चित्र तक वे संसद में नहीं लगा पाए , उन्हें भारत रत्न के लायक तक नहीं समझा , खुद को जिन्दा रहते ही भारत रत्न दे दिया मगर उनके लिए आज भागे भागे फिर रहे हैं। एक और हैं जो यह समझते हैं कि आंबेडकर उनके पेटेंट हैं। तिलक तराजू और तलवार , इनको मारो जूते चार , से इनकी राजनैतिक यात्रा शुरू हुई और आज एक ब्राह्मण मिश्रा के सलाह पर ये राजनीती की राह चल रही हैं। अम्बेडकर ने आरक्षण की व्यवस्था शुरू हुई। कालांतर में यह प्रोमोशन में आरक्षण में भी बढ़ा। और इस प्रोमोशन में आरक्षण को समाप्त करने वाली उत्तर प्रदेश की एक पार्टी के साथ मिलकर ये सरकार बनाने की इच्छा रखती हैं।
किसी को इस बात पर कोई मलाल नहीं है कि किसी ने अतीत में इनके नाम से राम जी हटा दिया था। वर्षों पहले सरकारी चैनल पर एक कार्यक्रम आया करता था जिसका नाम था - कृषि दर्शन , कृषि दर्शन की शुरुआत राम राम जी से होती थी जिसका मतलब सर नमस्कार होता था जैसा कि गांव में नमस्ते के लिए राम राम कहा जाता है। लेकिन इस देश की धर्मनिरपेक्ष आँखों को यह राम राम जी नहीं सुहाया। हटा दिया। और बाद में आंबेडकर जी के नाम से भी। भीमराव रामजी आंबेडकर। इसी का संक्षेप है - बी आर आंबेडकर।
डॉ आंबेडकर हिन्दू धर्म में अस्पृश्यता से इतने दुखी हुए कि बौद्ध धर्म अपना लिया मगर आज उनकी ही लड़ाई है कि वे किसके हैं। वे बौद्ध हैं। क्या हममें से कोई दलाई लामा के लिए लड़ रहा है कि वे किसके हैं , नहीं। क्योंकि दलाई लामा ने संविधान नहीं लिखा। मगर संविधान तो उन्होंने सबके लिए लिखा तो फिर यह लड़ाई क्यों कि वे किसके हैं ? कुछ लोगों ने जिंदगी भर अम्बेकर के लिए कुछ नहीं किया यहां तक कि उन्हें चुनाव तक हरा दिया मगर वे भी उनका झंडा उठाये फिर रहे हैं। उनका चित्र तक वे संसद में नहीं लगा पाए , उन्हें भारत रत्न के लायक तक नहीं समझा , खुद को जिन्दा रहते ही भारत रत्न दे दिया मगर उनके लिए आज भागे भागे फिर रहे हैं। एक और हैं जो यह समझते हैं कि आंबेडकर उनके पेटेंट हैं। तिलक तराजू और तलवार , इनको मारो जूते चार , से इनकी राजनैतिक यात्रा शुरू हुई और आज एक ब्राह्मण मिश्रा के सलाह पर ये राजनीती की राह चल रही हैं। अम्बेडकर ने आरक्षण की व्यवस्था शुरू हुई। कालांतर में यह प्रोमोशन में आरक्षण में भी बढ़ा। और इस प्रोमोशन में आरक्षण को समाप्त करने वाली उत्तर प्रदेश की एक पार्टी के साथ मिलकर ये सरकार बनाने की इच्छा रखती हैं।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)